लाल बहादुर शास्त्री जी की जीवनी

 


नमस्कार दोस्तो आज मै जिस व्यक्ति के बारे में आपको बताने जा रहा हूं उन्होंने अपना सारा जीवन देश की सेवा में समर्पित कर दिया ।इनके जैसा नेता भारत के राजनीतिक इतिहास में अभी तक नहीं आया। ये एक दम साधारण व्यक्ति थे सिर्फ धोती कुर्ते में रहते थे। इनका जीवन बहुत ही सरल था शुद्ध शाकाहारी भोजन जमीन पर बैठ कर करते थे । छोटे कद के होने के कारण इनका मजाक बनाया जाता था सब इनके साधारण कपड़ों को देख कर मजाक बनाया करते थे । लेकिन इनको सिर्फ अपने काम से मतलब था । जो आगे चलकर देश के दूसरे प्रधानमंत्री  बने जिनका नाम लाल बहादुर शास्त्री जी था । सिनेमा घरों में जो विज्ञापन होते थे उसमे जब इनकी फोटो को दिखाया जाता था तो लोग इनको देख के हंसते थे कि ये है हमारे देश के प्रधानमंत्री प्रेस कांफ्रेंस में रिपोर्टर इनको ऐसे ट्रीट करते थे कि जैसे कोई आम नागरिक हो इसलिए ये जाना ही बंद कर दिए थे।
नेहरु जी को अगर कोई भी समस्या होती थी। या किसी भी राजनीतिक विषयों पर चर्चा करनी होती थी तो हमेशा शास्त्री जी को ही समस्या के समाधान के लिए बुलाते थे। नेहरू जी शास्त्री जी को एक अच्छा सालहकर मानते थे।

लाल शास्त्री जी का बचपन

लाल बहादुर शास्त्री जी का जन्म मुगलसराय में 2 अक्टूबर 1904 में हुआ था। जब ये 18 महीने के हुए तब इनके पिता शारदा प्रसाद जी का निधन हो गया था।  इनके चाचा जी ने इनके परिवार की देखभाल की । इनके बचपन में इनके साथ बहुत सी घटनाएं घटी जो आपके लिए बहुत प्रेरणा दायक है। 

*इनका बचपन कठिनाईयों भरा रहा है । एक बार इन्होने एक बगीचे से एक फूल को तोड लिया फिर वहां के माली ने इनको पकड़ लिया और खूब डांट लगाई शास्त्री जी डांट सुनकर रोने लगे फिर माली ने इनको समझाया की बिना किसी की इजाजत  लिए किसी की चीज को नहीं लेना चाहिए। इस बात का शास्त्री जी के मन में बहुत गहरा प्रभाव पड़ा तब से इन्होने ठान लिया कि जीवन में कभी किसी की चीज को बिना किसी की आज्ञा लिए नहीं लूंगा ।

*जब ये स्कूल जाते थे तो रास्ते में नदी पड़ती थी। शास्त्री जी का स्कूल नदी के उस पार था। उसको पार करने के लिए नाव चलती थी लेकिन इनके पास पैसे नहीं होते थे जो नाव पे बैठ सके ।  नाविक कहता भी था कि मै तुमसे किराया नहीं लूंगा तुम बैठ जाओ आके । तब ये बोलते थे नहीं मै आपका एहसान नहीं लूंगा इसलिए नहीं कि मुझे आपसे कुछ शिकायत है बल्कि इसलिए क्योंकि यह मेरे उसूलों के खिलाफ है  क्युकी उस एक इंसान की जगह घेर कर मै आपका पैसा मार रहा हूं। अपनी यूनिफॉर्म उतार कर सर पर रख कर नदी को  तैर कर पार किया  करते थे। ये थी उनके अंदर determination

* एक बार इनके स्कूल के हैड मास्टर जोकि अंग्रेजी के टीचर होते है वह सबको एक असाइनमेंट देते है अब लाल बहादुर शास्त्री जी के पास किताब खरीदने तक के पैसे नहीं होते है  सुबह टेस्ट होता है उनका एक दोस्त होता है जिस से वो किताब उधार लेते है पूरी रात मेहनत करते है पूरी किताब को कॉपी में उतारते है ओर पूरी रात पढ़ाई करते  है । ओर अगले दिन पूरी कक्षा में अब्बल आते है टीचर बहुत खुश होते है लेकिन ये एक गलती करते है ये किताब नहीं लाते है फिर टीचर गुस्सा भी करते है इनको डांट पड़ती है। शास्त्री जी रोते है तब इनका दोस्त टीचर के पास जाता है और समझता है की सर ये इतने गरीब है कि इनके पास किताब खरीदने के पैसे भी नहीं है इन्होने मुझसे किताब उधार लेके उसको अपनी कॉपी में पूरी रात उतारा ओर पढ़ाई की। दिल एक दम नरम हो जाता है टीचर का तब उनकी पूरी पढ़ाई का जिम्मा लेते है। इस कहानी से यह सीखने को मिलता है कि शास्त्री जी ने अपने उसूलों से समझौता कभी नहीं किया।

*लाल बहादुर शास्त्री जी इन्होने अपने नाम से जाति सूचक शब्द श्रीवास्तव हटा दिया था क़ियो की ये जाति बाद के बिल्कुल खिलाफ थे।

*1925 में जब शास्त्री जी काशी विद्यापीठ से स्नातक कर के आते है तब इनको शास्त्री जी की उपाधि मिलती है। क्युकी शास्त्री का मतलब होता है जिसको हर किसी का ज्ञान हो क्युकी इन्होने बहुत ज्ञान अर्जित कर लिया था।

 

शास्त्री जी का राजनीतिक जीवन

लाल बहादुर शास्त्री जी महात्मा गांधी जी से बहुत ज्यादा प्रभावित थे। शास्त्री जी गांधी जी को अपना गुरु मानते थे। जब 20साल की उम्र में शास्त्री जी गांधी जी के  छोटे बड़े अभियानों में हिस्सा लेने लगे थे। हमेशा इनके अंदर देश के प्रति प्यार ओर सम्मान कुट कूट के भरा हुआ था। दांडी मार्च में गांधी जी को जेल हुई थी तब शास्त्री जी भी जेल गए थे।


नेहरू जी शास्त्री जी से अत्यधिक प्रभावित थे वह हमेशा इनको अपना बहुत अच्छा मित्र मानते थे।  उस समय कांग्रेस पार्टी ही सत्ता में थी जब नेहरू जी प्रधानमत्री बनाए गए  तब शास्त्री जी को परिवहन मंत्री के रूप में इनको नेहरू जी ने पहला पद दिया जिसको इन्होने बखूबी निभाया।
*नेहरू जी एक बहुत हूं प्रसन्न व्यक्ति थे हमेशा शास्त्री जी से मजाक किया करते थे और शास्त्री जी भी अपने अंदाज में जबाव दिया करते थे। एक बार कैबिनेट की पार्टी चल रही थी नेहरू जी ओर शास्त्री जी साथ में थे। तब नेहरू जी को माजक सूझा उन्होंने 2 समोसे उठाए और शास्त्री जी के जेब में डाल दिए। ओर नेहरू जी बोले देखो शास्त्री जी ने अपनी जेब में समोसे रख लिए चुपके से। तब शास्त्री जी मुस्कुराए ओर बोले पार्टी अभी कहा खत्म हुई है पार्टी तो गाड़ी में हम ओर नेहरू जी एक साथ करेंगे ओर ड्राइवर को भी तो खिलाना है उनकी यह बात सुनकर सब हसने लगे तो ऐसे विचार धारा के थे शास्त्री जी हमेशा सबको सरलता से जवाब देते थे।

परिवहन मंत्री के बाद नेहरू जी इनको अपनी केबिनेट मे लाना चाहते थे फिर इनको रेल मंत्री बनाया गया था।
रेल मंत्री बनाए जाने के बाद शास्त्री जी ने मंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया था।वो इसलिए क्योंकि एक बार ट्रेन हादसा हो गया था तब शास्त्री जी ने कहा कि यह मेरी नैतिक जिम्मेदारी हैं। ओर फिर उन्होंने इस्तीफा दे दिया था।

पंडित जवाहर लाल नेहरू जी का 1964 में निधन हो जाता है शास्त्री जी बहुत ही दुखी होते है। अब शास्त्री जी को छोड़ कर बाकी सभी की आंखे नेहरू जी की कुर्सी पे आ जाती है । सभी की मीटिंग में  इंदिरा गांधी जी का नाम दिया जाता है कि अब नेहरू जी की उत्तराधिकारी इंदिरा जी ही प्रधानमत्री बन ने के काबिल है लेकिन इंदिरा गांधी जी मना के देती है अभी मै  देश को संभालने के लायक नहीं हूं। फिर कामराज जी जो कि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री होते है उनके द्वारा शास्त्री जी को प्रधानमंत्री पद के चुना जाता है बहुत से लोगों को यह बात सही नहीं लगती है कि ये क्या देश को चलाएंगे । लेकिन कामराज जी को शास्त्री जी पे पूर्ण रूप से विश्वास होता है कि इनसे अच्छा भारत को दूसरा प्रधान मंत्री नहीं मिल सकता।

अब यहां से शास्त्री जी की असली कहानी की शुरुआत होती है। शास्त्री जी कोई भी VIP सुविधा नहीं लेते थे । हमेशा साधारण ही रहते थे ।

* एक बार रूस के प्रधानमंत्री ने इनको अपने देश बुलाया ये गए वहां इनको प्रधानमंत्री जी ने शास्त्री जी को एक मखमल का कोट उपहार में दिया जब अगले दिन गए तो प्रधानमंत्री जी ने पूछा कि कोट आपको पसंद नहीं आया है।
तब शास्त्री जी बोलते की आपका कोट बहुत अच्छा था लेकिन जब मै आ रहा था कि रास्ते में एक आदमी सर्दी में बहुत ठिठुर रहा था मुझ से ज्यादा उस आदमी को कोट की जरूरत थी वो मैने उसको दे दिया ये सुनकर प्रधान मंत्री जी बहुत खुश हुए।

*एक बार पाकिस्तान के एक रिपोर्टर ने शास्त्री जी से पूछा कि हमारे देश के प्रधान मंत्री जी अयूब खां आपसे काफी लंबे चौड़े है ओर आप इतने छोटे कद के केसे संभालते है सारी व्यवस्था को शास्त्री मुस्कुराते हुए बोलते है कि आपके प्रधान मंत्री जी हमेशा सिर झुका के चलते है ओर मै सिर ऊपर कर के चलता हूं तो उनसे मेरा कद बढ़ा हुआ है।
एक बार इनके पुत्र अनिल शास्त्री जी जिद करते है कि आप प्रधानमंत्री है तो एक घर में कार नहीं है। तब शास्त्री जी बैंक से लोन लेके एक गाड़ी खरीदते है। सोचिए कितने ईमानदार थे शास्त्री जी आज के ज़माने में एक विधायक के ड्राइवर के पास भी लाखो की सम्पत्ति होती है और शास्त्री  देश के प्रधानमंत्री होने के बावजूद भी इतने साधारण थे।

भारत पाकिस्तान युद्ध (1965)


  उस समय अमेरिका पाकिस्तान के साथ था ओर भारत बिल्कुल अकेला उस समय हमारी सेना ज्यादा ताकत बर नहीं थी। इसका फायदा उठा ते हुए पाकिस्तान ने जम्मू कश्मीर पर हमला कर दिया ओर कब्जा करने को तैयार हो गया था।
शास्त्री जी पर दबाव बनाया जाने लगा। सेना ने शास्त्री जी से कहा कि ऐसे तो हम जम्मू कश्मीर को हमेशा के लिए खो देंगे तब शास्त्री जी ने आदेश दिया कि अगर वो  जम्मू कश्मीर को ले जाते है तो ले जाए हम पूरे पाकिस्तान पे कब्जा कर लेंगे । तब उन्होंने इंटरनेशनल बॉर्डर  को खोल दिया और लाहौर पर कब्जा कर लिया था यह देख के पाकिस्तान डरने लगा । अब अमेरिका ने कहा कि हम आपको गेहूं को निर्यात नहीं करेंगे । फिर शास्त्री जी ने देश की जनता से आग्रह किया कि आप सभी एक दिन का उपवास देश के लिए करेंगे । सभी ने प्रधानमंत्री जी बात मानी  ओर सभी देश वासियों ने देश का साथ दिया। लोग सोमवार को बाज़ार बन्द रखते थे और घर में ही सब्जियां उगाने लगे। तब शास्त्री जी ने कनाडा से मदद मांगी । ओर गेहूं निर्यात होने लगा ।
अब पाकिस्तान के पैर उखाड़ने लगे ओर बह पीछे हटने लगा। शास्त्री जी पहले प्रधानमंत्री थे जिन्होंने आदेश दिया कि इंटरनेशनल बॉर्डर खोल दो ओर घुस के मरो। उसके बाद पूरे विश्व में शास्त्री जी की प्रशंसा होने लगी । तब इन्होने ने नारा दिया था।
जय जवान जय किसान


रहस्यमय मृत्यु



Taskent agriment के एक दिन बाद 11 जनवरी 1966 इनकी मृत्यु उज़्बेकिस्तान में हुई थी  जिसका कारण हार्ट अटेक बताया जा रहा था लेकिन इनके पुत्र अनिल शास्त्री का कहना था कि इनके बॉडी पे चोट के निशान भी थे और लोगो को कहना था कि इनको जहर देके मारा गया है।


इनकी पत्नी ने अपनी पुस्तक ललिता के अंसूं में कहा है कि इनकी हत्या हुई थी। शास्त्री जी की मृत्यु के बाद इन्हें भारत रत्न्न मिला।
शास्त्री जी की मृत्यु के बाद मानो इनके परिवार पर दुखो का पहाड़ टूट पड़ा हो एक किराए के कमरे में रहते थे । उसके बाद आर्थिक रूप से कमजोर हो गए थे और शास्त्री जी ने जो कार लोन पे ली थी उसको भी नहीं भरा गया था यह बात जब इंदिरा गांधी जी को पता चली तो उन्होंने तुरन्त आदेश दिया कि इनका लोन माफ़ कर दिया जाए और रहने को  आवास दिया जाए।

तो दोस्तो यह थी कहानी भारत के महान विचारक नेता  लाल बहादुर शास्त्री जी की जिनके सामने सारा देश नतमस्तक हो गया था । इनसे हम सभी को सीख लेनी चाहिए कि आप अगर साधारण है तो आप भी बहुत कुछ हासिल कर सकते है बस आपमें सहनशीलता और दृढ़ निश्चय होना जरूरी है। अगर आपको कहानी अच्छी लगी हो तो कमेंट बॉक्स में कमेंट जरूर करे कि आपको शास्त्री जी की कोन सी बात प्रवाहित करती है। धन्यवाद

1 comment:

  1. भारत में हमेशा अच्छे लोगो को दबाया जाता है।क्रांति शुर होने से पहले ही अंत हो जाती है।अगर इस साहसी प्रधानमंत्री की हत्या ना होती तो आज भारत का रूप कुश ओर होता

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