दशहरा "विजयदशमी" व नवरात्रि का पर्व

 दशहरा "विजयदशमी"



भारत एक बहुमुखी संस्कृति का देश है, यहा हर राज्यो में अनेकों त्योहारे मनाये जाते है, मगर दशहरा हिन्दुओ का मुख्य त्योहार है,और मनाये भी क्यों ना, इसमें हमारी आस्था भी जुड़ी हुई है,और यही आस्था पीढ़ी दर पीढ़ी इसे आगे बढ़ने का कार्य करती है।

पहले हमारे पूर्वज इसे मानते थे और अब विरासत में मिले इस संस्कृति को आगे बढ़ाने का काम हम करेंगे।

तो चलिए सुरु करते है।

नमस्कार मैं :- आशुतोष कन्नौजिया

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दशहरा का आयोजन हिंदी के (कुवार) मास के दूसरे पक्ष यानी शुक्ल पक्ष के दसवे तिथि को किया जाता है, बताया जाता है कि इसी तिथि को भगवान श्रीराम ने लंकापति रावण का वध किया था, तथा माँ दुर्गा ने नौ रात्रि के बाद दसवे दिन के युद्ध मे महिषासुर का वध कर विजय प्राप्त की थी।



इस पावन त्यौहार को असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है, इसलिए श्री राम का दसवे दिन रावण को मारना तथा माँ दुर्गा का दसवे दिन महिषासुर का वध किया इस लिए इसे विजयदशमी के नाम से भी जाना जाता है।

इस हर्ष और उल्लास का त्यौहार दशहरा का आरंभ रामायण काल से चला आ रहा है।

प्रथम दिन से लेकर दसवे दिन तक पूरे भारत मे जो दिव्य वातावरण होता है, मानो पूरा संसार इस तिथि का इंतजार बड़े लंबे अरसे से कर रहा हो।

एक तरफ हमारे घर की महिलाये माँ दुर्गा के नवो रूपो का सेवा सत्कार करती है, वही दूसरी तरफ पुरुष का एक बड़ा वर्ग रामलीला देखने,दिखाने और उस रामलीला में भाग लेकर अपना योगदान देते रहते है।

इस दिन भारत के हर गांव और शहर में छोटे-बड़े स्तर पर मेलो का भी आयोजन होता है, रावण का विशाल पुतला बना कर दसवे दिन की रात अपने एक निश्चित समय पर उस पुतले को राम के हाथों जलाया जाता है,जलाने के बाद जय श्रीराम का जय घोष होता है।



भारत के कुछ प्रमुख क्षेत्र में दशहरा को भिन्न भिन्न रूपो में मनाते है।


हिमाचल प्रदेश :- हिमाचल प्रदेश में कुल्लू का दशहरा,इस दशहरे में स्त्रिय और पुरुष दोनों सुन्दर वस्त्र पहन कर तथा हाथ मे विभिन्न प्रकार के वाद्य यंत्र लेकर अपने मुख्य देवता रघुनाथजी की  वंदना करते है, साथ ही सभी मिलकर एक पालकी नुमा जुलूस निकलते है जो शहर के चारो ओर घुमाया जाता है।


पश्चिम बंगाल,ओडिशा,और असम :- ये पर्व  तीनो राज्यो में दुर्गा पूजा के रूप में मनाते है,सही मायने में यही के लोगो का सबसे प्रमुख त्यौहार है, यहा का दशहरा विश्व प्रसिद्ध है, क्योंकि यहां के बड़े बड़े पंडालों में माँ दुर्गा की बड़ी बड़ी मुर्तिया विराजी जाती है।

विश्व मे उच्च कोटि का पंडाल कोलकाता में लगाया जाता है, यहां का पंडाल बनाने के लिए देश-विदेश से कारीगर को बुलाया जाता है।

यहां की महिलाये देवी माँ को सिन्दूर चढ़ाती है और आपस मे लगाती भी है, कहा जाता है कि इस क्षेत्र में उस दिन नीलकंठ पक्षी को देखना बडा ही शुभ माना जाता है।



गुजरात:- गुजरात मे माँ दुर्गा का रंगीन घड़ा एक प्रतीक के रूप में माना जाता है, इस दिन कुवारी लडकिया अपने सिर पर घड़ा रखकर एक लोकप्रिय नृत्य करती है, जिसे गरबा कहा जाता है, यहा पर माँ दुर्गा के आरती के बाद डांडिया का भी आयोजन किया जाता है, आज के दौर में डांडिया  तकरीबन हर राज्य में खेला जाता है।



नवरात्रि के सभी दिन माँ दुर्गा की उपासना सहृदय से की जाती है, हमारे घर की स्त्रियां नौवे दिन नौ देवीओ के प्रतीक के रूप में कन्याओ को भोग लगती है तथा उनसे आशीर्वाद की कामना भी करती है, फिर दसवे दिन माँ दुर्गा को विदा करते है, और अगले वर्ष पुनः आने की कामना करते है।

                 धन्यवाद............

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